मेरठ, जिसे 1857 की क्रांति की जननी कहा जाता है, वहां से एक बार फिर इतिहास के पन्नों में दबे नायक कोतवाल धन सिंह गुर्जर को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' देने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। सामाजिक संगठनों और स्थानीय प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार से इस महान क्रांतिकारी के बलिदान को उचित सम्मान देने की अपील की है।

कौन थे धन सिंह गुर्जर?

10 मई 1857 को जब मेरठ की छावनी में विद्रोह की ज्वाला भड़की, उस समय धन सिंह गुर्जर मेरठ के कोतवाल थे। उन्होंने न केवल ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत करने वाले सैनिकों का साथ दिया, बल्कि जेल के ताले तुड़वाकर 800 से अधिक कैदियों को मुक्त कराया था। उनके नेतृत्व में हजारों ग्रामीणों ने मेरठ के सदर बाजार और कैंट इलाके में अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे।

मांग के पीछे के मुख्य तर्क:

  • क्रांति के सूत्रधार: इतिहासकारों का मानना है कि धन सिंह गुर्जर ने पुलिस बल और आम जनता के बीच समन्वय बिठाकर क्रांति को जन-आंदोलन का रूप दिया था।

  • ऐतिहासिक उपेक्षा: समर्थकों का कहना है कि इतिहास की किताबों में धन सिंह गुर्जर के योगदान को वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे हकदार थे।

  • सांस्कृतिक पहचान: पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विशेषकर मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में उन्हें एक लोक नायक के रूप में पूजा जाता है।

कार्यक्रमों के जरिए एकजुटता

हाल ही में मेरठ में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों और गोष्ठियों में वक्ताओं ने कहा कि धन सिंह गुर्जर का बलिदान देश की आजादी की नींव का पत्थर है। 'भारत रत्न' की मांग को लेकर जल्द ही एक ज्ञापन प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भी भेजे जाने की तैयारी है। लोगों का मानना है कि उन्हें यह सम्मान देना उन तमाम गुमनाम शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

मेरठ और 10 मई का कनेक्शन

आज भी मेरठ में 10 मई को 'क्रांति दिवस' के रूप में बड़े गर्व के साथ मनाया जाता है। धन सिंह गुर्जर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उनकी बहादुरी की गाथाएं सुनाई जाती हैं। अब यह मांग एक अभियान का रूप ले चुकी है कि इस वीर योद्धा के नाम को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च पहचान मिले।