नई दिल्ली: नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए बेहद महत्वपूर्ण 'ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट' को हरी झंडी दे दी है। करीब 92,000 करोड़ रुपये की इस महत्वाकांक्षी परियोजना को भारत के रणनीतिक और आर्थिक भविष्य के लिए 'गेम-चेंजर' माना जा रहा है। हालांकि, विपक्ष और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इसे लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं।
क्या है ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट?
इस प्रोजेक्ट के तहत ग्रेट निकोबार द्वीप के दक्षिणी सिरे पर चार मुख्य स्तंभों का निर्माण किया जाना है:
इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल: जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों के करीब होगा।
ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट: रक्षा और नागरिक उड़ानों के लिए।
गैस और सौर ऊर्जा प्लांट: द्वीप की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए।
एक नया टाउनशिप: आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए।
भारत के लिए क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
रणनीतिक दृष्टि से यह प्रोजेक्ट भारत को हिंद महासागर में अपनी पकड़ मजबूत करने और 'मलक्का जलडमरूमध्य' (Strait of Malacca) पर नजर रखने में मदद करेगा, जहां से चीन का अधिकांश व्यापार होता है। आर्थिक रूप से, यह भारत को वैश्विक समुद्री व्यापार का एक बड़ा केंद्र बना सकता है, जिससे अरबों डॉलर का राजस्व प्राप्त होगा।
सोनिया गांधी और विपक्ष की चिंता क्या है?
कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी ने इस परियोजना को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनके विरोध के मुख्य कारण हैं:
पर्यावरण का विनाश: आरोप है कि इस प्रोजेक्ट के लिए लाखों पेड़ों को काटा जाएगा और कोरल रीफ (मूंगा चट्टानों) को भारी नुकसान होगा।
आदिवासी संरक्षण: यह द्वीप 'शोंपेन' और 'निकोबारी' जैसी दुर्लभ जनजातियों का घर है। विपक्ष का कहना है कि उनकी संस्कृति और अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
लेदरबैक कछुए: इस द्वीप पर दुनिया के सबसे बड़े कछुए अंडे देने आते हैं, जिनका आवास खत्म होने का डर है।
सरकार और NGT का पक्ष
केंद्र सरकार का तर्क है कि परियोजना में सुरक्षा और विकास का संतुलन बनाया गया है। एनजीटी ने भी माना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों को देखते हुए यह प्रोजेक्ट जरूरी है, हालांकि इसके साथ सख्त पर्यावरणीय शर्तें भी लागू की गई हैं।
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