
बच्चों को बचाने के लिए मां ने खुद को आग में झोंका, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था
मेरठ | मेरठ के किदवई नगर में हुए भीषण अग्निकांड की दास्तां सुनकर हर किसी की आंखें नम हैं। इस हादसे में रुखसार नाम की महिला ने अपने बच्चों को मौत के मुंह से निकालने के लिए आखिरी सांस तक संघर्ष किया, लेकिन आग की लपटें इतनी विकराल थीं कि वह उन्हें बचा नहीं सकीं।
ममता और बहादुरी की आखिरी जंग
चश्मदीदों और बचाव दल के अनुसार, जब घर की दूसरी मंजिल पर आग लगी, तो रुखसार ने भागने के बजाय अपने बच्चों को सुरक्षित करने की कोशिश की। उन्होंने बच्चों को चादरों और कंबलों से ढक दिया ताकि उन्हें तपिश और धुएं से बचाया जा सके। वह खुद आग और धुएं के बीच दीवार बनकर खड़ी रहीं, लेकिन जहरीले धुएं ने दम घोंट दिया।
बंद कमरा बना मौत का जाल
हादसे के वक्त कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था और खिड़कियों पर लोहे की मजबूत ग्रिल लगी थी। बाहर खड़े लोग और पड़ोसी चिल्लाते रहे, लेकिन अंदर फंसी रुखसार और पांच मासूम बच्चे बाहर नहीं निकल पाए। जब तक फायर ब्रिगेड और स्थानीय लोग दीवार तोड़कर अंदर पहुंचे, तब तक दम घुटने और झुलसने के कारण सभी की मौत हो चुकी थी।
मस्जिद से लौटते ही उजड़ गया संसार
परिवार के पुरुष सदस्य उस समय पास की मस्जिद में ईशा की नमाज अदा करने गए थे। जैसे ही वे नमाज पढ़कर बाहर निकले, उन्हें अपने ही घर से उठती आग की लपटें दिखाई दीं। जब तक वे मौके पर पहुंचे, उनका पूरा संसार उजड़ चुका था। चीख-पुकार और मातम के बीच पूरे मोहल्ले में सन्नाटा पसरा हुआ है।
शॉर्ट सर्किट या लापरवाही?
प्रारंभिक जांच में बिजली के शॉर्ट सर्किट को ही आग का कारण माना जा रहा है। घर में रखे कपड़ों के स्टॉक ने आग में घी का काम किया, जिससे चंद मिनटों में ही पूरा कमरा 'गैस चैंबर' बन गया। प्रशासन अब इस बात की जांच कर रहा है कि क्या घर में सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी।
निष्कर्ष
मेरठ का यह हादसा सिर्फ एक अग्निकांड नहीं, बल्कि एक मां के बलिदान और बेबसी की वो कहानी है जिसे शहर कभी नहीं भूल पाएगा। रुखसार की बहादुरी ने यह साबित कर दिया कि एक मां अपने बच्चों के लिए अपनी जान दांव पर लगा सकती है, लेकिन इस त्रासदी ने प्रशासन को भी घनी बस्तियों में फायर सेफ्टी के प्रति सचेत रहने की बड़ी चेतावनी दी है।
0 टिप्पणियाँ