बिजनौर/मेरठ: उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पुलिस की एक बड़ी लापरवाही और जल्दबाजी का मामला सामने आया है। जिस युवक को AK-47 के साथ 'खतरनाक आतंकी' समझकर हिरासत में लिया गया था और जिसके तार आतंकी संगठनों से जोड़े जा रहे थे, वह जांच में पूरी तरह निर्दोष पाया गया। एटीएस (ATS) की क्लीन चिट के बाद अब इस मामले में गाज पुलिस अधिकारियों पर गिरी है। लापरवाही बरतने के आरोप में दरोगा को सस्पेंड कर दिया गया है और क्षेत्राधिकारी (CO) को उनके पद से हटा दिया गया है।
खिलौना गन बनी 'आतंकी साजिश' का आधार
पूरा मामला तब शुरू हुआ जब पुलिस को सूचना मिली कि एक युवक के पास अत्याधुनिक हथियार (AK-47) है।
जल्दबाजी में कार्रवाई: स्थानीय पुलिस ने बिना गहन जांच के युवक को दबोच लिया और सोशल मीडिया व प्रेस में इसे एक बड़ी आतंकी कामयाबी की तरह पेश किया गया।
एटीएस की जांच: मामला गंभीर होने के कारण यूपी एटीएस (UP ATS) को जांच सौंपी गई। एटीएस ने जब हथियार की बारीकी से जांच की, तो वह महज एक खिलौना (Toy Gun) निकला, जो दिखने में असली जैसा था।
निर्दोष युवक: पूछताछ और बैकग्राउंड चेक के बाद एटीएस ने युवक को पूरी तरह क्लीन चिट दे दी और बताया कि उसका किसी भी देश विरोधी गतिविधि से कोई लेना-देना नहीं है।
पुलिस विभाग में हड़कंप: कार्रवाई की मार
बिजनौर पुलिस की इस 'अति-उत्साही' और गलत कार्रवाई ने विभाग की काफी किरकिरी कराई है।
दरोगा सस्पेंड: प्राथमिक जांच में दोषी पाए गए संबंधित दरोगा (Sub-Inspector) को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।
CO पर एक्शन: मामले की गंभीरता और मॉनिटरिंग में चूक को देखते हुए क्षेत्राधिकारी (CO) को भी पद से हटाकर मुख्यालय संबद्ध कर दिया गया है।
विभागीय जांच: एसपी बिजनौर ने पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच के आदेश दिए हैं ताकि भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति न हो।
क्या है पूरा घटनाक्रम?
बता दें कि पिछले कुछ दिनों से पश्चिमी यूपी में एटीएस की सक्रियता और आतंकी मॉड्यूल (जैसे अबू बकर स्लीपर सेल) के खुलासों के बीच पुलिस काफी दबाव में थी। इसी दबाव और 'क्रेडिट' लेने की होड़ में बिना पुष्टि किए युवक को आतंकी घोषित करने की कोशिश की गई, जिससे एक निर्दोष व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची।
मानवाधिकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल
इस घटना ने एक बार फिर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पुष्टि का अभाव: विशेषज्ञों का कहना है कि किसी को भी सार्वजनिक रूप से 'आतंकी' कहने से पहले ठोस सबूत और फॉरेंसिक रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए।
जनता में संदेश: पुलिस महानिदेशक कार्यालय ने सभी जिलों को निर्देश दिए हैं कि संवेदनशील मामलों में प्रेस ब्रीफिंग से पहले तथ्यों की 100% पुष्टि सुनिश्चित की जाए।
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