वॉशिंगटन: अमेरिका और ईरान के बीच जारी भीषण तनाव के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीटर हेगसेथ (Pete Hegseth) ने एक चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त नीतियों और सैन्य दबाव के आगे ईरान झुकने को मजबूर हो गया है। हेगसेथ के अनुसार, ईरान आधिकारिक तौर पर 'युद्धविराम' (Ceasefire) के लिए गुहार लगा रहा था।
'दबाव की नीति' का परिणाम
पीटर हेगसेथ ने एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान कहा कि ट्रंप प्रशासन द्वारा अपनाई गई "मैक्सिमम प्रेशर" (Maximum Pressure) की रणनीति ने तेहरान को ऐसी स्थिति में ला खड़ा किया है जहाँ उसके पास अब समझौते के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
हेगसेथ का बयान: उन्होंने दावा किया कि ईरान अपनी आर्थिक बदहाली और सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों के बाद पूरी तरह टूट चुका है और अब शांति की भीख मांग रहा है।
ट्रंप का प्रभाव: रक्षा सचिव ने इसका श्रेय राष्ट्रपति ट्रंप के 'पीस थ्रू स्ट्रेंथ' (शक्ति के माध्यम से शांति) के दृष्टिकोण को दिया, जिसके तहत ईरान को स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि किसी भी हिमाकत का अंजाम विनाशकारी होगा।
युद्धविराम की शर्तों पर सस्पेंस
हालांकि हेगसेथ ने यह दावा किया कि ईरान बातचीत की मेज पर आने के लिए बेताब है, लेकिन युद्धविराम की शर्तों को लेकर अभी भी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा: अमेरिका की मुख्य शर्त है कि ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य से अपना कब्जा हटाए और अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए रास्ता पूरी तरह सुरक्षित करे।
हथियारों पर रोक: वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों (Proxies) को मिल रही फंडिंग को तुरंत बंद करे।
तेहरान की प्रतिक्रिया
दूसरी ओर, ईरान के सरकारी मीडिया और अधिकारियों ने इन दावों को 'मनोवैज्ञानिक युद्ध' (Psychological Warfare) करार दिया है। ईरान का कहना है कि वे किसी भी धमकी के आगे झुकने वाले नहीं हैं और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए अंत तक लड़ेंगे। हालांकि, सूत्रों का मानना है कि ईरान के भीतर बढ़ते घरेलू असंतोष और ऊर्जा संकट ने सरकार को झुकने पर मजबूर किया हो सकता है।
वैश्विक कूटनीति में हलचल
पीटर हेगसेथ के इस बयान के बाद वैश्विक कूटनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है। यूरोपीय देश और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए हैं। यदि युद्धविराम सफल होता है, तो यह मध्य पूर्व में दशकों से चले आ रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम हो सकता है।
फिलहाल, दुनिया की नजरें व्हाइट हाउस की अगली घोषणा पर टिकी हैं कि क्या सच में दोनों देश किसी औपचारिक समझौते की ओर बढ़ रहे हैं या यह केवल दबाव बनाने की एक नई चाल है।
0 टिप्पणियाँ