मेरठ से पकड़े गए आरोपियों समीर खान और तुषार उर्फ हिजबुल्लाह अली से पूछताछ में एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के हैंडलर्स अब भारतीय मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल कर पाकिस्तान में बैठकर व्हाट्सएप (WhatsApp) चला रहे हैं। इस गंभीर मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए अब राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) भी इस नेटवर्क की जांच में शामिल हो सकती है।
कैसे काम करता है यह 'डिजिटल जाल'?
आरोपियों ने खुलासा किया कि समीर ने ISI के मेजर और गैंगस्टर शहजाद भट्टी के कहने पर भारत में मोबाइल सिम खरीदे और उन्हें सक्रिय (Activate) किया।
कोड शेयरिंग: इन नंबरों पर व्हाट्सएप शुरू करने के लिए ओटीपी (OTP) भारत में समीर के पास आता था।
एक्टिवेशन: समीर यह कोड पाकिस्तान में बैठे हैंडलर्स को भेज देता था।
रिमोट एक्सेस: एक बार कोड मिलते ही व्हाट्सएप पाकिस्तान में एक्टिव हो जाता है, जबकि सिम कार्ड भारत में ही रहता है।
की-पैड फोन वाले मासूम लोग भी निशाने पर
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों ने ऐसे लोगों के नंबरों का भी इस्तेमाल किया जो केवल की-पैड फोन (साधारण फोन) चलाते हैं और व्हाट्सएप का उपयोग नहीं करते। ऐसे लोगों को पता भी नहीं चलता कि उनके नंबर पर सरहद पार कोई व्हाट्सएप अकाउंट चलाया जा रहा है।
भारतीय नंबर ही क्यों?
पकड़े जाने का डर कम: पाकिस्तान का कंट्री कोड +92 है, जिससे सुरक्षा एजेंसियां तुरंत सतर्क हो जाती हैं। भारतीय नंबरों (+91) के इस्तेमाल से वे आसानी से सुरक्षा रडार से बच निकलते हैं।
भ्रम पैदा करना: भारतीय नंबरों का इस्तेमाल कर ये हैंडलर्स सेना के जवानों या आम नागरिकों को हनीट्रैप या सूचनाएं जुटाने के लिए आसानी से निशाना बना सकते हैं।
सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई
मेरठ पुलिस और एटीएस (ATS) इस मामले में समीर खान और इरम जैसी कड़ियों को जोड़ रही है। चूंकि यह मामला अंतरराष्ट्रीय जासूसी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है, इसलिए NIA इस पूरे सिंडिकेट के विदेशी फंडिंग और स्लीपर सेल कनेक्शन की गहराई से जांच करेगी।
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