मेरठ: मेरठ के इतिहास का सबसे काला दिन माना जाने वाला 'विक्टोरिया पार्क अग्निकांड' आज अपनी 20वीं बरसी पर एक बार फिर शहरवासियों की आंखों में आंसू दे गया। 10 अप्रैल 2006 को हुए उस भीषण हादसे की यादें आज भी पीड़ितों के जेहन में ताजा हैं। अपनों को खोने का गम और पिछले दो दशकों से जारी न्याय की लंबी लड़ाई ने परिवारों को तोड़कर रख दिया है।
क्या हुआ था उस मनहूस दिन?
10 अप्रैल 2006 को विक्टोरिया पार्क में एक विशाल 'कंज्यूमर गुड्स फेयर' (उपभोक्ता मेला) लगा था।
भयानक मंजर: शाम के समय अचानक शॉर्ट सर्किट के कारण मेले के पंडाल में आग लग गई। सिंथेटिक कपड़ों और भारी मात्रा में प्लास्टिक के सामान के कारण आग ने चंद मिनटों में ही पूरे मेले को अपनी चपेट में ले लिया।
अव्यवस्था की मार: पंडाल में प्रवेश और निकास के रास्ते संकरे थे, जिससे भगदड़ मच गई। इस अग्निकांड में आधिकारिक तौर पर 65 लोगों की मृत्यु हुई थी, जबकि सैकड़ों लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे।
20 साल और न्याय का इंतजार
हादसे के बाद जांच कमेटियां बनीं और मुआवजे की घोषणाएं भी हुईं, लेकिन पीड़ित परिवारों का कहना है कि असली न्याय अभी भी अधूरा है।
दोषियों पर कार्रवाई: पीड़ित लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि उन अधिकारियों और आयोजकों पर सख्त कार्रवाई हो जिनकी लापरवाही से सुरक्षा मानकों की अनदेखी की गई थी।
कानूनी लड़ाई: मामला सालों तक सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में चलता रहा। मुआवजे की राशि को लेकर भी कई बार विवाद हुए और कानूनी पेच फंसा रहा।
यादगार की मांग: पीड़ितों की मांग रही है कि विक्टोरिया पार्क में उन शहीदों की याद में एक स्थायी स्मारक बनाया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही दोबारा न हो।
आज नम आंखों से दी गई श्रद्धांजलि
बरसी के अवसर पर आज विक्टोरिया पार्क में पीड़ितों के परिजनों और शहर के गणमान्य नागरिकों ने मौन रखकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी।
कैंडल मार्च: शाम को एक छोटा कैंडल मार्च भी निकाला गया, जिसमें 'न्याय में देरी, न्याय न मिलने के बराबर है' के पोस्टर देखे गए।
दर्द साझा किया: बरसी पर जुटे लोगों ने एक-दूसरे का ढांढस बंधाया। कई ऐसे लोग भी पहुंचे जो उस हादसे में गंभीर रूप से झुलस गए थे और आज भी उन जख्मों के निशान अपने शरीर और रूह पर लेकर जी रहे हैं।
सुरक्षा मानकों पर आज भी सवाल
इस अग्निकांड के बाद देशभर में सार्वजनिक आयोजनों के लिए कड़े नियम बनाए गए, लेकिन मेरठ के लोग आज भी सवाल उठाते हैं कि क्या वाकई प्रशासन ने इस बड़े हादसे से कोई सबक सीखा है? शहर में होने वाले बड़े मेलों और कार्यक्रमों में आज भी अक्सर सुरक्षा मानकों की अनदेखी देखी जाती है।
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