अंकारा/वाशिंगटन: मध्य पूर्व में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव और युद्ध के मुहाने पर खड़ी वैश्विक स्थिति को देखते हुए तुर्की (Turkey) ने एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका अपना ली है। तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने इस संघर्ष को सुलझाने और एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध को रोकने के लिए 'राजनयिक मिशन' (Diplomatic Mission) शुरू किया है। तुर्की ने एक साथ कई देशों से संपर्क साधकर समाधान निकालने की कोशिशें तेज कर दी हैं।
राष्ट्रपति एर्दोगन का 'शांति मिशन'
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, तुर्की ने केवल ईरान और अमेरिका ही नहीं, बल्कि रूस, कतर और कई यूरोपीय देशों के प्रमुखों से भी संवाद किया है। तुर्की का तर्क है कि इस क्षेत्र में कोई भी नया संघर्ष न केवल मध्य पूर्व बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए विनाशकारी साबित होगा। एर्दोगन ने चेतावनी दी है कि आग की ये लपटें पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकती हैं, इसलिए संयम बरतना अनिवार्य है।
रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है तुर्की की भूमिका
तुर्की, नाटो (NATO) का सदस्य होने के साथ-साथ ईरान का पड़ोसी भी है, जिसके चलते उसकी स्थिति बेहद खास हो जाती है। तुर्की के अमेरिका के साथ रक्षा संबंध हैं, तो वहीं ईरान के साथ उसके मजबूत व्यापारिक और ऊर्जा लिंक हैं। यही कारण है कि अंकारा दोनों पक्षों के बीच एक 'पुल' का काम करने की कोशिश कर रहा है।
क्या निकलेगा कोई ठोस समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि तुर्की का हस्तक्षेप एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन समाधान की राह इतनी आसान नहीं है। मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
परमाणु कार्यक्रम: अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते (JCPOA) को लेकर पुराना गतिरोध।
क्षेत्रीय वर्चस्व: इराक और सीरिया जैसे देशों में दोनों देशों के सैन्य हितों का टकराव।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य: समुद्री व्यापारिक मार्ग पर नियंत्रण को लेकर जारी खींचतान।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें
रूस और चीन ने भी तुर्की की इस पहल का स्वागत किया है, जबकि अमेरिका की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है कि वह तुर्की की मध्यस्थता को किस हद तक स्वीकार करेगा। दूसरी ओर, ईरान ने स्पष्ट किया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन अपनी संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेगा।
वैश्विक बाजार पर प्रभाव
इस संघर्ष और तुर्की की मध्यस्थता की खबरों के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार (Oil Market) में भारी उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अगर तुर्की कोई समाधान निकालने में सफल रहता है, तो कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता आ सकती है, अन्यथा वैश्विक मुद्रास्फीति का खतरा और बढ़ जाएगा।
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