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मवाना और किला परीक्षितगढ़ में गूंजा 'इंकलाब जिंदाबाद': शहीद दिवस पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को दी गई श्रद्धांजलि

 


मवाना/मेरठ: 23 मार्च के ऐतिहासिक अवसर पर मवाना और किला परीक्षितगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में 'शहीद दिवस' (Shaheed Diwas) श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले अमर शहीद सरदार भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु के बलिदान को याद करते हुए स्थानीय लोगों और सामाजिक संस्थाओं ने उन्हें नमन किया।

देशभक्ति के नारों से गुंजायमान हुए कस्बे

मवाना और आसपास के इलाकों में सुबह से ही विभिन्न संगठनों द्वारा प्रभात फेरियां और गोष्ठियों का आयोजन किया गया। शहीद स्मारकों और महापुरुषों की प्रतिमाओं पर माल्यार्पण कर उनकी वीरगाथा को याद किया गया। युवाओं ने 'भगत सिंह अमर रहें' और 'भारत माता की जय' के गगनभेदी नारे लगाए, जिससे पूरा वातावरण देशभक्ति के रंग में रंग गया।

किला परीक्षितगढ़ में विशेष आयोजन

ऐतिहासिक कस्बे किला परीक्षितगढ़ में भी विभिन्न विद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं ने शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की। वक्ताओं ने कहा कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने महज 23-24 साल की उम्र में देश के लिए जो बलिदान दिया, वह युगों-युगों तक युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।

  • सीख: गोष्ठियों में इस बात पर जोर दिया गया कि आज की युवा पीढ़ी को इन क्रांतिकारियों के वैचारिक साहित्य को पढ़ना चाहिए।

  • संकल्प: स्थानीय निवासियों ने देश की एकता और अखंडता को बनाए रखने का संकल्प लिया।

युवाओं और छात्रों में दिखा भारी उत्साह

स्कूलों और कॉलेजों में आयोजित कार्यक्रमों में छात्रों ने नाटक (Skit) और कविताओं के माध्यम से 23 मार्च 1931 की उस गौरवशाली घटना का सजीव चित्रण किया। शिक्षकों ने बच्चों को बताया कि किस तरह इन वीरों ने ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। मवाना के मुख्य चौराहों पर भी लोगों ने मोमबत्तियां जलाकर वीर सपूतों को याद किया।

सामाजिक समरसता और राष्ट्रवाद का संदेश

शहीद दिवस के इन कार्यक्रमों में समाज के हर वर्ग ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। स्थानीय नेताओं और गणमान्य नागरिकों ने कहा कि शहीदों का कोई धर्म या जाति नहीं होती, वे पूरे राष्ट्र की धरोहर हैं। ऐसे आयोजनों से आने वाली पीढ़ी में राष्ट्रीयता की भावना प्रबल होती है।

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