वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के मंच पर एक बार फिर अपने चिर-परिचित अंदाज में बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने दावा किया है कि उनके हस्तक्षेप और कूटनीतिक कौशल के कारण अब चीन, ईरान को हथियारों की आपूर्ति नहीं करेगा। इतना ही नहीं, ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों का हवाला देते हुए कहा कि "शी जिनपिंग मुझे गले लगाएंगे" (Xi Jinping will hug me) और अमेरिका के हितों का सम्मान करेंगे।
ईरान की घेराबंदी में चीन का साथ?
राष्ट्रपति ट्रंप का यह बयान उन अटकलों के बीच आया है जिनमें ईरान को मिल रही विदेशी सैन्य मदद को रोकने की कोशिश की जा रही है।
ट्रंप का भरोसा: ट्रंप ने विश्वास जताया कि वे चीन को इस बात के लिए राजी कर लेंगे कि ईरान को सैन्य रूप से मजबूत करना वैश्विक शांति के लिए ठीक नहीं है।
व्यक्तिगत केमिस्ट्री: ट्रंप ने जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल कागजी समझौतों पर नहीं, बल्कि नेताओं के बीच के व्यक्तिगत तालमेल और सम्मान पर टिके होते हैं। उन्होंने संकेत दिया कि शी जिनपिंग के साथ उनकी 'केमिस्ट्री' जटिल मुद्दों को भी सुलझा सकती है।
टैरिफ की चेतावनी का असर!
विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप का यह नरम और दोस्ताना बयान असल में उनकी 'कठोर आर्थिक नीतियों' की अगली कड़ी है।
आर्थिक दबाव: हाल ही में ट्रंप ने उन देशों पर 50% टैरिफ लगाने की धमकी दी थी जो ईरान की मदद करेंगे। माना जा रहा है कि चीन अपनी अर्थव्यवस्था को अमेरिकी बाजार से बचाने के लिए ट्रंप की शर्तों पर विचार कर सकता है।
सौदागर वाली नीति: ट्रंप की "आर्ट ऑफ द डील" वाली छवि यहाँ साफ झलकती है, जहाँ वे एक तरफ व्यापारिक युद्ध की चेतावनी देते हैं और दूसरी तरफ व्यक्तिगत मित्रता का हाथ बढ़ाते हैं।
वैश्विक कूटनीति पर प्रभाव
यदि ट्रंप का यह दावा हकीकत में बदलता है, तो यह मध्य पूर्व के समीकरणों को पूरी तरह बदल देगा।
ईरान का अलगाव: यदि चीन अपने कदम पीछे खींचता है, तो ईरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी हद तक अकेला पड़ जाएगा, जिससे उसकी सैन्य और परमाणु महत्वाकांक्षाओं को बड़ा झटका लगेगा।
अमेरिका-चीन संबंध: यह देखना दिलचस्प होगा कि बीजिंग इस 'हग' (गले मिलने) वाले बयान पर क्या प्रतिक्रिया देता है। चीन आमतौर पर अपनी संप्रभुता और विदेश नीति में किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को पसंद नहीं करता है।
क्या यह केवल चुनावी रणनीति है?
राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे ट्रंप की घरेलू राजनीति और 'अमेरिका फर्स्ट' एजेंडे को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देख रहा है। वे यह दिखाना चाहते हैं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली नेता भी उनके सामने झुकने या समझौता करने को तैयार हैं।
फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें बीजिंग के विदेश मंत्रालय पर टिकी हैं कि क्या वे ट्रंप के इस दावे की पुष्टि करते हैं या इसे महज एक राजनीतिक बयानबाजी करार देते हैं।
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