कुशीनगर: उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद में किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने और कृषि लागत को कम करने के लिए कृषि मंत्रालय और स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र ने एक शानदार पहल की है। केंद्र सरकार की प्राथमिकताओं के अनुरूप, जिले में गन्ने के साथ मूंगफली की सह-फसली (Intercropping) खेती को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा रहा है। इस आधुनिक कृषि तकनीक से न केवल किसानों को अतिरिक्त मुनाफा होगा, बल्कि खेत की उर्वरा शक्ति (Soil Fertility) में भी भारी सुधार देखने को मिलेगा।
क्या है गन्ने और मूंगफली की सह-फसली प्रणाली?
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गन्ना एक ऐसी फसल है जिसकी शुरुआती ग्रोथ (बढ़त) काफी धीमी होती है और दो लाइनों के बीच में काफी खाली जगह बची रहती है। इस खाली जगह का सही उपयोग करने के लिए कृषि विभाग किसानों को गन्ने की दो कतारों के बीच में मूंगफली बोने की सलाह दे रहा है। मूंगफली एक कम समय (लगभग 100 से 110 दिन) में तैयार होने वाली फसल है। जब तक गन्ने की फसल बड़ी होकर पूरी जमीन को घेरती है, तब तक मूंगफली की खुदाई पूरी हो जाती है।
किसानों को मिलेंगे यह तीन बड़े फायदे
कृषि विशेषज्ञों ने इस सह-फसली पद्धति के वैज्ञानिक और आर्थिक लाभों को रेखांकित किया है:
अतिरिक्त और नकद आमदनी: किसानों को गन्ने की मुख्य फसल के साथ-साथ मूंगफली बेचकर कम समय में नकद पैसा मिल जाता है, जिससे उनकी रोजमर्रा की जरूरतें पूरी होती हैं।
प्राकृतिक खाद (नाइट्रोजन फिक्सेशन): मूंगफली एक दलहनी फसल है। इसकी जड़ों में पाए जाने वाले बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन सोखकर जमीन में स्थिर करते हैं, जिससे मिट्टी को प्राकृतिक रूप से यूरिया मिल जाता है और मुख्य फसल (गन्ने) का उत्पादन भी बढ़ जाता है।
खरपतवार और पानी की बचत: खाली जगह में मूंगफली के पौधे फैल जाने के कारण खेतों में अनचाही घास (खरपतवार) नहीं उग पाती, जिससे निराई-गुड़ाई का खर्च बचता है और नमी बनी रहने के कारण पानी भी कम लगता है।
कृषि मंत्रालय दे रहा है मुफ्त बीज और प्रशिक्षण
इस तकनीक को जमीनी स्तर पर लोकप्रिय बनाने के लिए कृषि मंत्रालय की विभिन्न योजनाओं के तहत कुशीनगर के प्रगतिशील किसानों को मूंगफली के उन्नत किस्मों के बीज और मिनी-किट मुफ्त या भारी सब्सिडी पर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। इसके साथ ही, गांवों में विशेष किसान पाठशालाओं और गोष्ठियों का आयोजन किया जा रहा है, जहाँ कृषि वैज्ञानिक किसानों को लाइन से लाइन की दूरी बनाए रखने, खाद के सही प्रबंधन और आधुनिक बुवाई के तौर-तरीकों का लाइव प्रशिक्षण दे रहे हैं।
पारंपरिक रूप से केवल गन्ने पर निर्भर रहने वाले कुशीनगर के किसानों के लिए यह मॉडल एक गेम-चेंजर साबित हो रहा है। कृषि अधिकारियों का दावा है कि इस सह-फसली खेती को अपनाकर किसान भाई प्रति एकड़ अपनी लागत को करीब 25 से 30 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं और मुनाफे को दोगुना तक बढ़ा सकते हैं। जिले के कई किसानों ने इस व्यवस्था को हाथों-हाथ लिया है और खेतों में इसके सकारात्मक परिणाम भी दिखने शुरू हो गए हैं।
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