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यूपी चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी में इस्तीफों की झड़ी

 

उत्तर प्रदेश: राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों (UP Vidhan Sabha Chunav) की सुगबुगाहट तेज होते ही राजनीतिक गलियारों में भारी उठापटक शुरू हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के भीतर अचानक मचे इस घमासान और विधायकों व वरिष्ठ नेताओं द्वारा दिए जा रहे ताबड़तोड़ इस्तीफों ने सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। टिकट कटने के खौफ और चुनावी रणनीतिकार एजेंसी आई-पैक (I-PAC) के फीडबैक के कारण पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा आंतरिक संकट खड़ा हो गया है, जिसके चलते अखिलेश यादव को कड़े फैसले लेने पड़ रहे हैं।

इस्तीफों के पीछे 'टिकट कटने का खौफ' और कड़ा रुख 

पार्टी सूत्रों के अनुसार, समाजवादी पार्टी नेतृत्व इस बार प्रत्याशियों के चयन को लेकर बेहद सख्त और आक्रामक रुख अपना रहा है। सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने साफ कर दिया है कि जिन मौजूदा विधायकों की जमीनी रिपोर्ट खराब है या जो अपने क्षेत्रों में जनता के बीच सक्रिय नहीं रहे हैं, उन्हें दोबारा टिकट नहीं दिया जाएगा। इस कड़े रुख की भनक लगते ही कई वर्तमान विधायकों और पूर्व मंत्रियों में अपना राजनीतिक भविष्य असुरक्षित नजर आने लगा है। टिकट कटने की इसी आशंका और खौफ के चलते नेता पार्टी विरोधी बयानबाजी कर रहे हैं या चुनाव से ऐन पहले पाला बदलने के लिए अपने पदों से इस्तीफे सौंप रहे हैं।

क्यों हुई चुनावी रणनीतिकार एजेंसी I-PAC की छुट्टी? 

सपा के भीतर मचे इस घमासान का एक सबसे बड़ा कारण मशहूर चुनावी रणनीतिकार एजेंसी आई-पैक (I-PAC) की अचानक हुई छुट्टी भी माना जा रहा है। दरअसल, पार्टी ने अंदरूनी सर्वे और चुनावी रणनीति तैयार करने का जिम्मा आई-पैक को सौंपा था।

  • नेताओं की नाराजगी: आई-पैक की टीम ने जमीनी स्तर पर जाकर जो सर्वे किया, उसमें कई दिग्गज और पुराने समाजवादियों की रिपोर्ट नकारात्मक (Negative) आई। एजेंसी ने कई सीटों पर चेहरे बदलने की दो टूक सिफारिश कर दी, जिससे पार्टी के पुराने और वफादार नेताओं में भारी असंतोष और बगावत की स्थिति पैदा हो गई।

  • आंतरिक दबाव: पुराने नेताओं का तर्क था कि बाहरी एजेंसी के लोग जमीन की वास्तविक और पारंपरिक राजनीति को नहीं समझ सकते। इस आंतरिक दबाव और बगावत को थामने के लिए आखिरकार पार्टी नेतृत्व को आई-पैक से अपना किनारा करना पड़ा या उनकी भूमिका को बेहद सीमित करना पड़ा है, ताकि पार्टी को और अधिक टूट से बचाया जा सके।

बगावत रोकने और डैमेज कंट्रोल में जुटे अखिलेश यादव 

चुनाव से ठीक पहले इस तरह की अंदरूनी कलह और इस्तीफों की झड़ी किसी भी राजनीतिक दल के लिए बड़ा झटका साबित हो सकती है। यही वजह है कि समाजवादी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब तुरंत 'डैमेज कंट्रोल' (नुकसान की भरपाई) में जुट गया है। नाराज विधायकों और बागियों को मनाने के लिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसके साथ ही, जिन सीटों पर नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, वहां तुरंत नए और जिताऊ समीकरणों को साधने के लिए स्थानीय जातीय और सामाजिक गणित को नए सिरे से टटोला जा रहा है।

निष्कर्ष: अग्निपरीक्षा के दौर से गुजर रही सपा 

विधानसभा चुनाव की दहलीज पर खड़ी समाजवादी पार्टी के लिए यह समय किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। एक तरफ जहां पार्टी को सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) का फायदा उठाने के लिए नए और बेदाग चेहरों पर दांव लगाना है, वहीं दूसरी तरफ अपने पुराने और रसूखदार नेताओं को जोड़े रखना भी एक बड़ी चुनौती है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अखिलेश यादव इस आंतरिक बगावत को शांत कर चुनावी रण में विपक्ष को कितनी मजबूत चुनौती दे पाते हैं।

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